भारत में संसदीय समितियाँ – 360° विश्लेषण (UPSC राजनीति विज्ञान)
परिचय
संसदीय समितियाँ भारतीय संसद की महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं, जो विधेयकों, नीतियों और सरकारी व्यय की विस्तृत जाँच करती हैं। ये समितियाँ संसद की कार्यक्षमता बढ़ाने तथा सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
संसदीय समितियों की आवश्यकता
- संसद के पास विस्तृत चर्चा के लिए सीमित समय होता है
- जटिल विधेयकों की विशेषज्ञ स्तर पर जाँच आवश्यक होती है
- सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित होती है
- नीति निर्माण अधिक प्रभावी बनता है
संसदीय समितियों के प्रकार
1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees)
- स्थायी प्रकृति की होती हैं
- समय-समय पर पुनर्गठित की जाती हैं
- उदाहरण: लोक लेखा समिति (PAC), प्राक्कलन समिति
2. तदर्थ समितियाँ (Ad Hoc Committees)
- अस्थायी समितियाँ होती हैं
- विशेष उद्देश्य के लिए बनाई जाती हैं
- कार्य पूरा होने पर समाप्त हो जाती हैं
महत्वपूर्ण समितियाँ
- लोक लेखा समिति (PAC): CAG रिपोर्ट की जाँच
- प्राक्कलन समिति: बजट और व्यय का विश्लेषण
- लोक उपक्रम समिति: सार्वजनिक उपक्रमों की समीक्षा
- विभाग संबंधी स्थायी समितियाँ: मंत्रालयों और विधेयकों की समीक्षा
मुख्य कार्य
- विधेयकों की विस्तृत जाँच
- वित्तीय नियंत्रण और लेखा परीक्षण
- कार्यपालिका की निगरानी
- नीतियों का मूल्यांकन
महत्व
- लोकतांत्रिक जवाबदेही मजबूत होती है
- विधेयकों की गुणवत्ता बेहतर होती है
- दलीय सहयोग को बढ़ावा मिलता है
- पारदर्शिता और सुशासन को समर्थन मिलता है
वर्तमान परिप्रेक्ष्य
हाल के वर्षों में कई विधेयकों को समितियों के पास न भेजे जाने पर चिंता व्यक्त की गई है। इससे संसदीय जाँच की गुणवत्ता पर प्रश्न उठे हैं।
निष्कर्ष
संसदीय समितियाँ भारतीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इनके प्रभावी संचालन से शासन अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और कुशल बन सकता है।
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